फोकस साहित्य

लघु कथा : पिंजरे में बचपन

प्रकृति को निहारना, तारों के नीचे बैठना, भाई बहनों की आपसी मस्ती, दोस्तों के साथ खेलना !! यह तो सब तो अब पुराने ज़माने की बात हो गई....

लघु कथा : चक्रव्यूह

अपने नीरा को खाए एक सप्ताह हो गए। किसी तरह नमक पानी पीकर ऊर्जस्वित होती है। शायद दोड़ धूप की चादर ने उसकी भूख को ढक लिया है। अभी पति...

लघु कथा : अंतिम संस्कार

कहने को तो आज हमारा देश स्वतंत्र है, हमें खुल कर जीने का अधिकार है, स्वाभिमान से रहने का अधिकार है लेकिन शिवांगिनी के लिए ये सारी...

Mother's Day Special: बहुत याद आता है माँ का अंगना

माँ का वो अंगना प्यारा जीवन का पहला पाठशाला गिरते उठते हंसते रोते लड़ते झगड़ते तर्क वितर्क सबके बीच राह सुझाती तुम खेल खेल में बात...

लघु कथा: बहरे

आय हाय आग लगे ऐसी मर्दानगी और मुई इनकी जवानियों को, न बूढ़ी का लिहाज न पेटवाली का। बेचारी बच्ची जमीन पर ही लोट गई।बैठे हैं सारे टाँग...

विश्व पुस्तक दिवस विशेष : किताबें

किताबें लेने, देने मांगने के बहाने बहुत से रिश्ते संजोती थी ये किताबें कक्षा से कक्षा का सफर करती थी किताबें बहुत सहेजी‌ हुई पूंजी...

विश्व पुस्तक दिवस विशेष :पुस्तकों की दुनियाँ

संरक्षित इसमें इतिहास की हर घटना पाते यहीं श्रृषि मुनियों की हर रचना.....

लघु कथा : प्रायश्चित

घोर आश्चर्य यह था कि आज की भ्रमित पीढ़ी ऐसा कर रही है खुले आम अपने सहचर ,सहचरी को धोखा देकर,लेकिन इस खेल में एक संन्यासी का होना कई...

लघु कथा : प्रायश्चित

मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकती, तुमने मेरा विश्वास तोड़ा है, मैं इस घर को संवारने में लगी रही और तुम....छिः " सुगन्धा लगभग रो पड़ी.....

एक थी डॉ अर्चना शर्मा

डॉ अर्चना शर्मा की दिल को झकझोर देने वाली घटना के बाद देश की हर गायनेकोलोजिस्ट आज निस्संदेह विचार कर रही होगी कि ,” क्या ये देश इस...

नव संवत्सर हिन्दू नव वर्ष चैत्र मास,मन में भर देता है उल्लास

चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से चैत्र नवरात्रि का आरंभ होता है, माता का आगमन सबके घरों में नए नए अन्न का आना पूरे देश में हर्षोल्लास...

देश पढे़ देश बढ़े

कभी द्रोण को गुरु मानकर एकलव्य ने दे दिया था अंगूठा कभी पेड़ की छाँव में बुद्ध को मिल गया था ज्ञान । युग बदले नियम बदले बदली ज्ञान...

यादों का संदूक

जिसकी धूल झाड़ने से छींक नहीं चेहरे पर मुस्कान आती है …

कभी सोचा ना था

वादे किये थे हजार साथ निभाने के पर जब तुम्हारी नजरों ने साथ मांगा इतनी बेबस हो जाऊँगी कभी सोचा ना था.....